महावीर कुमार सोनी की दृष्टि में किस तरह शीघ्र विश्व गुरु बन सकता है भारत, इस हेतु क्या विशेष करने की है आवश्यकता

ज्योतिष के क्षेत्र में विशिष्ट नाम अर्जित कर चुके जयपुर निवासी महावीर कुमार सोनी मिलनसार स्वभाव के ऐसे व्यक्ति हैं जो पूरे विश्व में सर्व मैत्री भावना को देखना चाहते हैं, उनका मानना है कि हर प्राणी में ब्रह्म है, अतः किसी भी व्यक्ति, यहां तक कि प्रकृति के छोटे छोटे से प्राणी से भी द्वेष, नफरत या उसके प्रति जरा सी भी घात की भावना नहीं होनी चाहिए, उनका मानना है कि कर्म से ही जाति बनी है, अतः कोई भी व्यक्ति जाति आदि  के आधार पर छोटा या बड़ा नहीं हो सकता, सब समान है, सभी में आपस में प्रेम, सौहार्द, समरसता एवं स्नेह होना चाहिए, कोई भी व्यक्ति अपने द्वारा किए गए कर्मो से ही वो अच्छा या बुरा होता है न कि किसी जाति, समाज आदि में पैदा होने से बड़ा या छोटा हो सकता है। इसी विचारधारा के चलते सोनी सबसे मिलते हैं, सभी वर्गों व राजनैतिक पार्टी के लोगों से मिलते रहते हैं, कोई भी पार्टी हो या संगठन हो, उनमें जब किसी व्यक्ति से संपर्क बढ़ता है तो वे अपने विचारों को शेयर करने का प्रयास करते हैं। उनका मानना है कि भारत अपनी प्राचीन कालीन समृद्वि को जब ही प्राप्त कर सकता है, जब सब एक हों, जाति, समाज एवं राजनैतिक दलों के लोगों में मतभेद न हो
उनका कहना है कि कहीं भी किसी स्तर पर विचारों में भिन्नता होना मनुष्य का स्वभाविक गुण है, इसके चलते विचार स्वतंत्रता होनी चाहिए, किन्तु एक दूसरे पर अपने विचारों को दूसरों पर थोपने की प्रवृत्ति सही नहीं है, जो हम सोचें वो ही हमेशा सही हो और दूसरा उसे माने ही, यह सही नहीं है, देश को विश्व गुरु बनाना है तो सबको एकजुटता का पाठ पढ़ना ही होगा, उसमें एक दूसरे से नफरत, ईर्ष्या, द्वेष को खत्म करना होगा, जो लोग ऐसी बात करें, उन्हें प्रेम एवं स्नेह पूर्वक बताना होगा, हमारी उन्नति हो, इस हेतु स्वस्थ प्रतिस्पर्धा एक हद तक सही हो सकती है किंतु अपने मन को मलीन करके तीव्र ईर्ष्या भाव धारण करना आत्मिक एवं लौकिक उन्नति में बाधक हैं।
महावीर कुमार सोनी अपने इन विचारों के चलते और समाज में कुछ विशेष करने की इच्छा चलते सरकारी नौकरी को ज्यादा समय तक न करके, जल्दी ही छोड़ बैठे, घर की आर्थिक स्थिति हमेशा खराब ही रही, बच्चियों की पढ़ाई में बाधा पड़ेगी, यह जानते हुए भी बंधी बंधाई तनख्वाह छोड़ कर खुद का छोटा मोटा व्यापार कर लेंगे, इतना तो कमाई लेंगे की घर का खर्चा चल सके, बेटियों को देश के नामी गिरामी कालेजो में न पढ़ा पाएंगे तो क्या बेटियां तररकी नहीं करेगी, इस सोच को त्याग कर एक साहसिक निर्णय लेकर समय से बहुत पहले, यानी 13 साल की बाकी सेवा छोड़कर नौकरी से आजाद हुए। सोचा कि समाजसेवा संबंधी अपने उद्देश्यों को वे अब ज्यादा स्वतंत्रता पूर्वक पूरा कर सकेंगे।

सोनी के जीवन में आर्थिक पक्ष को छोड़ दिया जाए तो सोनी मानते है कि सरकारी नौकरी छोड़कर उन्होंने वहां की तुलना में बहुत कुछ पाया, उन्हें इस बात की संतुष्टि है कि वो सक्षम न होते हुए भी देश व समाज हित में बहुत सी शॉर्ट फिल्में दे पाए, कुछ महान लोगों पर दो पुस्तकें जारी कर सके, देश व जनहित में अनेक रचनात्मक कार्यक्रम पहले से ज्यादा चला पाए।

बता दें कि महावीर कुमार सोनी सरकारी नौकरी में रहते हुए राजस्थान राज्य कर्मचारी संघ (युवा) एवं दूसरे बनाए गए राजस्थान राज्य अधिकारी कर्मचारी संयुक्त महासंघ के फाउंडर प्रेसिडेंट रहे, जिनमें भी उनका मुख्य उद्देश्य कर्मचारी हित की मांगों से भी ज्यादा राज्य एवं जनहित में अनेक रचनात्मक अभियानों व कार्यक्रमों का संचालन करना रहा, जिसमें सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं का लाभ आम जनता तक, ग्राम ग्राम तक ज्यादा से ज्यादा रूप में पहुंचे, कर्मचारी संगठनों की शक्ति द्वारा यह ज्यादा अच्छे रूप में करना सम्भव रहा।

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